जिनको बुरा लगेगा वही इस गंदगी से बाहर निकलना चाहेगा |

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एक बार कांशीरामजी सडक से कही जा रहे थे | रास्ते के किनारे में एक नाले में कुच कुत्ते के बच्चे ऊस नाले में गिर हुए थे | कांशीराम जी ने ऊनमे से दो कुत्ते के बच्चो को नाले के बाहर निकला | और दो बच्चो को वैसे ही नाले में छोड दिया | 

इसपर एक साथी ने कांशीरामजी से पुंछा सर जी आपने कुत्ते के दो बच्चो को नाले से बाहर निकला | और दो बच्चो को नाले में क्यु छोड दिया | 

तो कांशीरामजी ने जवाब दिया | मैने ऊनकी मदत की जिनको ऊस गंधे नाले से बाहर निकलना था | जो ऊस गंदे नाले से बाहर निकलने के लिये तडफडा रहे थे |  नाले के बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे |  मैने ऊनकी ही मदत की | बाकी जिनको ऊस गंदगी में परम आनंद मिल रहा है | वह नाले के बाहर निकलने की कोशिश नहीं कर रहे थे | मैने ऊनको वही छोड दिया | 

कांशीरामजी कहने का तात्पर्य जिस हिंदू धर्म को आज भी बहोत से दलित जातीया चिपकी हुई है | जो धर्म ऊनको अपनी जाती के कारणं बार बार अपमानित करता है |  इनके पुर्वजो को ! संतो को ! महापुरुषो को ! अपमानित कीया गया है | इन्हे मारा जाता है | पिटा जाता है | इनकी बहन बेटीयो की इज्जत लुटी जाती है | इनको छुना भी अपवित्र समझा जाता है |  इनको बेइज्जत कीया जाता है |  फीर भी यह लोग ऊस धर्म को सिने से लगाए बैठे है | 

भंगी को खुद्द को भंगी कहने की शर्म आती है | इसलिए वह खुद्द को वाल्मिकी कहते है | फीर भी चिपके हूए है | ऊसी धर्म को | मांग को खुद्द को मांग कहने की शर्म आती है | इसलिए वह खुद्द को मातंग कहता है | मातंग का मतलब महातंग ! याने महा परेशान !  ऐ महापरेशान भी है | फीर भी पडा हुवा है | ऊसी  धर्म में ! चमार. . को खुद्द को चमार कहने की शर्म आती है | इसलिए वह खुद्द को चर्मकार कहता है | मराठी  में एक कहावत है | चांभारांच्या देवाला खेटराचा मार ( (चमार के देवता को जुते की मार)  फीर भी  चिपके हूए है ऊसी धर्म को | इनको इसमे कुछ भी बुरा  या अपमान जैसा कुछ भी नहीं लगता है | ऐसी बहोत सी दलित जातीया है | जिनको अपनी जाती का नाम लेने से भी शर्म महसुस होती. 

मगर इतना सब कुछ होणे के बावजुद भी इनको इसी गंदगी में परम आनंद ले रहे है | क्यु के अब इनको इस गंदगी में रहने की आदत लग चुकी है |  इसलिए यह लोग इस गंदगी से बाहर निकलना ही नहीं चाहते है | बहुजन संतोने, महापुरुषो ने इनको इस गंदगी से बाहर निकालने की भरकस कोशिश की | 

डॉ. बाबासाहब आंबेडकर को यह गंदगी पसंत नहीं आयी | ऊन्होने इस गंदगी को छोड दिया | 

मगर मांग,चमार,भंगी,वडार,ढोर,मांग गारुडी ऐसे पुरे देश भर मे ऐसी बहोती सी दलित जातीया है | जो रोज बेइज्जत हो रहे है | ठोकर खा रहे फीर भी पडे हुए है | 

ऊन धर्म की चौकट पर इनको इसमे कुछ भी अपमानित नहीं लगता है | 

ये इसमे स्वर्ग का आनंद ले रहे है | अब जिनको बुरा लगेगा वही इस गंदगी से बाहर निकलना चाहेगा |

जयभीम,जय रोहीदास

संकलन -: पृथ्वीराज खैरे-9527264608,बदलापूर

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